Sunday, November 15, 2009

रोग, भोग और आढ़तियों का योग

PS Malik tells: रोग, भोग और आढ़तियों का योग

                                                                                    -- प्रताप श्रेयस्

चारों तरफ़ गुरुओं की धूम मची है। हर विपणक के यहाँ योग से सम्बन्धित सामग्री बिक रही है। चारों ओर आढ़त का बाजार लगा है। लोग योग बेच रहे हैं  कुछ अन्य लोग योग खरीद रहे हैं। कोई आसन बेच रहा है, कोई अच्छे वाले आसन ईजाद कर रहा है। कोई ध्यान के सस्ते दाम लगा रहा है। किसी दुकान पर कुण्डलिनी उठवाई जा रही है। कुछ लोग प्राणायाम बेच रहे हैं। बता रहे हैं कि माल अच्छा है, साथ में गारन्टी दे रहे हैं कि मोटापा कम कर देगा। इस ध्यान- योग के बाजार में कुछ दुकानों पर एक्सेसरीज़ भी बिक रही है। ज्यादा भीड़ उन दुकानों पर है जहाँ एक्सेसरीज़ या तो हर्बल है या फिर उन्हें आयुर्वेद में से कहीं से आया बताया जा रहा है। पूरे बाजार  में चहल पहल है। चतुर सुजान, उत्तम वस्त्र पहनकर दुकानों के काउन्टर पर विराजे हुए हैं। मुद्राओं को रेशमी थैलियों में बन्द करके नीचे सरका रहे हैं। कुछ लोग वहाँ दूर शेड के नीचे बैठे हैं। बिल्कुल चुप । पूछा - कौन हैं ? पता चला - बुद्धिजीवी हैं।

सवाल हाट के अस्तित्त्व पर नहीं हैं। हाट को तो होना ही है, यहाँ नहीं होगा तो कहीं और होगा। जब तक क्रेता  का थैला और विक्रेता का बटुआ है, भिन्न भिन्न स्पेस टाईम में हाट अवतरित होता रहेगा। यह अनिवार्य है। सवाल दुकानों पर तथा माल पर भी नहीं हैं। हाट है तो अच्छा, भला, बुरा सभी तरह का माल भी सप्लाई होगा ही। वणिक नियमों के तहत् गंजों को भी कंघी बेचने के प्रयास तथा इन प्रयासों में सफलता-असफलता सभी कुछ होगा। कभी कंघी बिक जाएगी और कभी नहीं भी बिकेगी। कंघी के कारीगर, आढ़तिये सब अपना अपना हिस्सा कैलकुलेट करते रहेंगे। बाजार का व्यापार यूँ ही चलता रहेगा। व्यापार को यूँ चलाना बाजार की फ़ितरत है। फ़ितरत पर सवाल नहीं खड़े किये जा सकते हैं। सवाल तब उठते हैं जब कोई अपनी फ़ितरत के खिलाफ़ काम करता है।

गंजे को कंघी बेचना वणिक चतुराई है। बाजार इस चतुराई की नींव पर ही खड़ा होता है। परन्तु बवासीर के रोगी को कंघी बेचना मैलप्रैक्टिस (महाठगी) है। ऐसे में बुद्धिजीवियों को उठ कर हस्तक्षेप करना चाहिये । ऐसे ठगों और ठगी के खिलाफ़ प्रतिरोध बुद्धिजीविय फ़ितरत है। आज का सवाल है कि अपनी फ़ितरत के बरख़िलाफ़ ये बुद्धिजीवी शेड के नीचे चुपचाप क्यों बैठे हैं।

ढाई हजार वर्ष पूर्व जब पातंजलि ने योगसूत्र लिखा तो गीता के ज्ञान के बाद, ज्ञात मानवीय इतिहास की वह सबसे विलक्षण घटना थी। मानवीय इतिहास में मानव की भीतरी परतों के बारे में इतनी क्राँतिकारी बातें आधुनिक विज्ञान से पहले कभी नहीं लिखी गईं हैं। योग, प्राचीन साँख्य दर्शन  का व्यवहारिक पक्ष है। साँख्य ने जिस तत्त्व (मेटाफ़िज़िक्स) की चर्चा की उस की प्राप्ति का मार्ग योग में दे दिया गया है। साँख्य कहता है कि प्रकृति तीन मूल गुणों का सम्मिलन है। सृष्टि के समय जब तीनों गुण आपस क्रिया करते है तो सबसे पहले महत् अर्थात् बुद्धि का निर्माण होता है। उससे अहँकार और फिर मन बनते हैं। मन के बाद पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (आँख, कान, नाक, रसना या जीभ और त्वक् या त्वचा) और फिर पाँच कर्मेन्द्रियाँ (वाणी, हाथ, पैर, जननेन्द्रिय, गुदा) विकसित होती हैं। विकास के अन्तिम चरण में पाँच तन्मात्राएं (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध) और पाँच महाभूत (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी) पैदा होते हैं। ये चौबीस तत्त्व (प्रकृति,महत्, अहंकार, मन, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच तन्मात्राएँ और पाँच महाभूत) पच्चीसवें पुरुष से मिलकर सृष्टि को रचते हैं।

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